

संघर्ष से ही सफलता की कहानी शुरू होती है -डॉक्टर संजय गुप्ता
हर दिन एक नया अवसर है, अपनी पहचान बनाओ-डॉक्टर संजय गुप्ता
ज्ञान की ओर बढ़ो, सफलता तुम्हारा इंतजार कर रही है-डॉक्टर संजय गुप्ता
विद्यार्थियों एवं अभिभावको के सवालो का जवाब दिए ख्यातिलब्ध शिक्षाविद डॉ. संजय गुप्ता ने
आज दिन-प्रतिदिन बढ़ती प्रतिस्पर्धा एवं तनाव भरी जिंदगी में विद्यार्थियों को मानसिक रूप से स्वस्थ व प्रसन्न रहना अतिआवश्यक है । लेकिन जैसे-जैसे परीक्षा नजदीक आती है विद्यार्थियों में मानसिक दबाव बढ़ते जाता है । वर्षभर नियमित व अनुशासित तथा समर्पित होकर भी हम परीक्षा की तैयारी करें तो भी परीक्षा के दिनों में हम पर मानसिक दबाव व तनाव अवश्य होता है । विद्यार्थियों के मन में विभिन्न प्रकार के प्रश्न उठने लगते हैं और वे सबसे ज्यादा अपने भविष्य के प्रति चिंतित होते हैं । ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देंगें क्षेत्र के ख्यातिलब्ध शिक्षाविद डॉ. संजय गुप्ता
1 -क्या प्रत्येक पीटीएम में अभिभावक का उपस्थित होना जरूरी है इसके क्या फायदे हो सकते हैं? नेहा साहू, झाबर
डॉ संजय गुप्ता – प्रत्येक पीटीएम में अभिभावक का विद्यालय में उपस्थित होकर विषय शिक्षकों से बात करना ,विद्यार्थी के परफॉर्मेंस को देखना ,अति आवश्यक होता है ।इससे ना सिर्फ हम विद्यार्थी की प्रगति से अवगत होते हैं ,अपितु शिक्षकों से भी हमें विशेष सलाह मिलते हैं और हम भी अपने विचार या अपनी सलाह विद्यार्थी की प्रगति के संबंध में शिक्षकों के समक्ष रख सकते हैं ।हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि पीटीएम शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों का आपस में तालमेल सुनिश्चित करते हैं ।पीटीएम का उद्देश्य किसी शिक्षक से लड़ना या झगड़ना नहीं है ।हम साधारण रूप से भी किसी शिक्षक से फोन पर भी बात करें तो हमें बहुत ही रिस्पेक्ट ,अदब और विनम्रता के साथ बात करनी चाहिए। अधिकांश अभिभावक सख्ती से व्यवहार करते हैं। शिक्षकों के साथ, जो कि कदापि उचित नहीं है ।शिक्षकों का सम्मान सनातनकाल से ही रहा है ।शिक्षक समाज का निर्माता होता है।शिक्षक एक सम्माननीय व्यक्तित्व होता है ।हमें या कभी नहीं भूलना चाहिए।
2 यदि कोई बच्चा कक्षा में गति से लिख नहीं पता ।सभी बच्चों के लिखने के बाद भी वह श्यामपट में दिए गए कार्य को तय समय में पूरा नहीं कर पाता। वह लिखने में अत्यंत कमजोर है ।और यदि उसके अभिभावक इस बात के लिए भी शिक्षक से या शिक्षिका से सख्ती से व्यवहार करें या उसकी शिकायत प्राचार्य महोदय से करें तो क्या यह उचित है?
निशा अग्रवाल बिलासपुर
डॉक्टर संजय गुप्ता – यदि कोई अभिभावक शिक्षक क्या शिक्षिका से तल्ख लफ्जों में बात करता है या करती है। या सख्ती से व्यवहार करता है तो यह सरासर गलत है। उन्हें शिक्षक और शिक्षा का महत्व दोनों समझ में आना चाहिए ।रही बात विद्यार्थी के द्वारा धीमे लिखने की ,या कार्य को सही समय पर पूर्ण नहीं करने की ,तो ऐसी स्थिति में हम बचे हुए कार्य को कक्षा के व्हाट्सएप ग्रुप में भेज सकते हैं। ताकि घर में उपस्थित अभिभावक अपने बच्चे को उस कार्य को पूर्ण करा दें। यदि तब भी अभिभावक यह कहता है या कहती है कि ये स्कूल की जिम्मेदारी है, विषय शिक्षक की जिम्मेदारी है ,तो यहां पर उन्हें भी समझना होगा कि शिक्षक या शिक्षिका के पास कक्षा में सिर्फ वह एक विद्यार्थी नहीं है इसके अतिरिक्त भी और विद्यार्थी हैं। शिक्षक या शिक्षिका को सभी विद्यार्थियों को समान रूप से ध्यान देना होता है। यदि एक विद्यार्थी पर ही ध्यान देने लग जाए तो कक्षा के अन्य विद्यार्थी छूट जाएंगे ।तो इस विषय पर अभिभावक को भी विनम्र होना चाहिए ।आखिर बच्चा उन्हीं का है। तो उनकी बेहतरी के लिए हम बचे हुए कार्यों को घर में भी करा सकते हैं ।तात्पर्य है यह है कि हम पूर्णतः स्कूल पर ही निर्भर ना रहे । कुछ हमारी भी जिम्मेदारी बनती है, एक अभिभावक होने के नाते । अतः शिक्षकों से भूलकर भी बदतमीजी ना की जाए ।यह सरासर गलत है ।इस बात को अभिभावकों को भी समझना होगा।
3 किसी भी विद्यालय में शिक्षण की गुणवत्ता किन किन कारकों पर निर्भर करती है ? संजय निषाद ,कटघोरा
डॉक्टर संजय गुप्ता – किसी भी विद्यालय की शिक्षण की गुणवत्ता वैसे तो विभिन्न कारकों का निर्भर करती है।इनमें से कुछ कारक हैं- शिक्षकीय स्टाफ की सावधानी पूर्वक नियुक्ति, विषय के प्रति शिक्षक की समझ ,शिक्षक के पढ़ाने का तरीका, विद्यालय का प्रबंधन,कक्षा की व्यवस्था, प्रत्येक विषय के लिए शिक्षकों का पूरा सेटअप, निरंतर शिक्षकीय स्टाफ का परिवर्तन ना होना, विद्यार्थियों को एवं शिक्षकों को उनके अच्छे एकेडमिक परफॉर्मेंस के लिए पुरस्कृत करना, समय-समय पर शिक्षकों की सुविधाओं का ख्याल रखना। विद्यार्थियों की उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की व्यवस्था हेतु किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना और सबसे जरूरी है विद्यालय में अनुशासन का होना। अगर यह सब किसी भी विद्यालय में सही हैं ,तो शिक्षण की गुणवत्ता भी अवश्य ही उच्च कोटि की होगी।
4-विद्यालय में शिक्षा का स्वस्थ माहौल कैसा होना चाहिए? शिक्षकीय स्टाफ के मध्य एक स्वस्थ वातावरण कैसे निर्मित किया जा सकता है? राहुल प्रजापति,बिलासपुर
डॉ संजय गुप्ता- हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि विद्यालय में कार्य करना आज की स्थिति में किसी चुनौती से कम कम नहीं है? खास कर अगर वह कोई निजी विद्यालय हो ।हम पर लगातार विद्यार्थियों का एवं अभिभावकों सहित प्रबंधन का दबाव बना रहता है। या कुल मिलाकर यह कहें कि हम सब के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि अभिभावक अपने बच्चों को हमारे विद्यालय में अध्ययन करने के लिए भेजते हैं तो उनका मानना है कि वह विद्यालय हमारे बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान करेगा ।तो हम शिक्षा के मामले में तो कोई समझौता ही नहीं कर सकते। रही बात विद्यालय के स्वस्थ वातावरण का तो टीचिंग स्टाफ के मध्य यदि स्वस्थ और ऊर्जामय वातावरण निर्मित करना है तो सर्वप्रथम हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमें किसी की भी बुराई को ज्यादा हवा नहीं देना चाहिए ।हमें लेग पुलिंग से बचना चाहिए। या सरल शब्दों में कहूं तो हमें प्रत्येक की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए। इंसानों से गलतियां होती हैं ,तो गलतियों को भी सुधारने का मौका देना चाहिए ।छोटी-छोटी गलतियों पर यदि हम सारे आम शिक्षक या शिक्षिका को बेइज्जत करेंगे तो उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है ।वह पूरी ऊर्जा के साथ कार्य नहीं करता है। खासकर विद्यालय में कोई सीनियर स्टाफ है ,जो बहुत पहले से विद्यालय में कार्य कर रहे हैं ।तो ऐसे स्टाफ को हमें संभाल कर और सम्मानजनक व्यवहार देकर रखना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में ना उनकी ना किसी भी शिक्षक या किसी भी कर्मचारी के आत्म सम्मान को ठेस न पहुंचे ।हमें ऐसे कार्य या ऐसे शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए ।हमें प्रत्येक अच्छे कार्य के लिए सभी स्टाफ को अप्रिशिएट करना चाहिए।
5 -इन दिनों बच्चों को छोटी कक्षा में भी ट्यूशन की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या स्कूल का अध्ययन अध्यापन पर्याप्त नहीं है इसके क्या कारण हो सकते हैं? हरीश तिवारी,भिलाई
डॉक्टर संजय गुप्ता – आपका प्रश्न एकदम तार्किक एवं महत्वपूर्ण है। इसके कई कारण हो सकते हैं प्रथम तो यह कि यदि विद्यालय में विद्यार्थी को पढ़ाया जा रहा है तो उसके ऊपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। या पढ़ने में ही कुछ कमी रह गई है ।जिसकी पूर्ति अभिभावक ट्यूशन से करते हैं। यदि विद्यालय में ही विद्यार्थी के हर कांसेप्ट को क्लियर कर दिया जाए। डेप्थ में जाकर टीचिंग की जाए, तो मैं समझता हूं कि विद्यार्थी को किसी ट्यूशन की कोई आवश्यकता नहीं है ।वह सिर्फ उस टॉपिक को घर में आकर पढ़ ले तो उसको पूरा समझ में आ जाता है। हमें ट्यूशन पर अनावश्यक खर्च करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती है। हमारा कर्तव्य है कि हम जाकर विशेष शिक्षकों से मिलें और वस्तु स्थिति को समझने का प्रयास करें। यदि कोई दिक्कत है तो विषय शिक्षक से या प्राचार्य महोदय से अवश्य मिलकर समाधान खोजें।